Rigveda / 10 / 175 / 4
ग्रावा॑णः सवि॒ता नु वो॑ दे॒वः सु॑वतु॒ धर्म॑णा । यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 175 | Mantra No : 4
In English:
Seer : uurdhvagraavaarbudaH | Devta : graavaaNaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : graavaaNaH savitaa nu vo devaH suvatu dharmaNaa . yajamaanaaya sunvate .
Component Words : graavaaNaH . savitaa . nu . vaH . devaH . suvatu . dharmaNaa . yajamaanaaya . sunvate . 10.175.4
In Hindi:
ऋषि : ऊर्ध्वग्रावार्बुदः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : ग्रावा॑णः । स॒वि॒ता । नु । वः॒ । दे॒वः । सु॒व॒तु॒ । धर्म॑णा । यज॑मानाय । सु॒न्व॒ते ॥ १०.१७५.४
पदार्थ : (ग्रावाणः) हे विद्वानों ! (वः) तुम्हें (सविता देवः-नु) प्रेरक विजयेच्छुक राजा शीघ्र (धर्मणा-सुवतु) कर्त्तव्य कर्म के द्वारा प्रेरित करता है (सुन्वते यजमानाय) राष्ट्र को बढ़ानेवाले प्रजाजन के लिए ॥४॥
भावार्थ : राजा राष्ट्र को बढ़ानेवाले प्रजाजन के लिए स्वयं कर्तव्यपरायण रहे और राष्ट्र के अधिकारी विद्वानों को भी कर्तव्यपरायण रहने का आदेश दे ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : ऊर्ध्वग्रावार्बुदः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : ग्रावा॑णः । स॒वि॒ता । नु । वः॒ । दे॒वः । सु॒व॒तु॒ । धर्म॑णा । यज॑मानाय । सु॒न्व॒ते ॥ १०.१७५.४
भावार्थ :