Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 182 / 2

नरा॒शंसो॑ नोऽवतु प्रया॒जे शं नो॑ अस्त्वनुया॒जो हवे॑षु । क्षि॒पदश॑स्ति॒मप॑ दुर्म॒तिं ह॒न्नथा॑ कर॒द्यज॑मानाय॒ शं योः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 182 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : तपुर्मूर्धा बार्हस्पत्यः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : नरा॒शंसः॑ । नः॒ । अ॒व॒तु॒ । प्र॒ऽया॒जे । शम् । नः॒ । अ॒स्तु॒ । अ॒नु॒ऽया॒जः । हवे॑षु । क्षि॒पत् । अश॑स्तिम् । अप॑ । दुः॒ऽम॒तिम् । ह॒न् । अथ॑ । क॒र॒त् । यज॑मानाय । शम् । योः ॥ १०.१८२.२

पदार्थ : (नराशंसः) मनुष्यों द्वारा-प्रशंसनीय स्तुति करने योग्य परमात्मा (नः) हमारी (प्रयाजे) रेतःसेचन कार्य में-गर्भाधान कार्य में (अवतु) रक्षा करे (नः शम् अस्तु) हमारे लिए कल्याणकारी हो (अनुयाजः) रेतोधारण-गर्भ का पोषण (क्षिपत्०) पूर्ववत् ॥२॥

भावार्थ : स्तुतियोग्य परमेश्वर गृहस्थों के गर्भाधान कार्य में कल्याणकारी हो तथा उसकी कृपा से गर्भपोषण भी कल्याणकारी हो ॥२॥