Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 3 / 9

पि॒शङ्ग॑रूपः सु॒भरो॑ वयो॒धाः श्रु॒ष्टी वी॒रो जा॑यते दे॒वका॑मः। प्र॒जां त्वष्टा॒ वि ष्य॑तु॒ नाभि॑म॒स्मे अथा॑ दे॒वाना॒मप्ये॑तु॒ पाथः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 3 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब पुरुषुविषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : पि॒शङ्ग॑ऽरूपः। सु॒ऽभरः॑। व॒यः॒ऽधाः। श्रु॒ष्टी। वी॒रः। जा॒य॒ते॒। दे॒वऽका॑मः। प्र॒ऽजाम्। त्वष्टा॑। वि। स्य॒तु॒। नाभि॑म्। अ॒स्मे इति॑। अथ॑। दे॒वाना॑म्। अपि॑। ए॒तु॒। पाथः॑॥

पदार्थ : जैसे (पिशङ्गरूपः) सुवर्ण के रूप के समान जिसका रूप (सुभरः) भरण-पोषण करता हुआ (वयोधाः) गर्भ स्थापन करनेवाला (देवकामः) और विद्वानों की कामना करता वह (श्रुष्टी) शीघ्र (वीरः) सकल विद्याओं को प्राप्त होनेवाला पुरुष (जायते) उत्पन्न होता है जैसे (त्वष्टा) विविध रूप रचनेवाला ईश्वर (अस्मे) हम लोगों को (प्रजाम्) सन्तान (विष्यतु) देवे। (अथ) इसके अनन्तर हम (देवानाम्) विद्वानों की (नाभिम्) नाभि को और (पाथः) रक्षा करनेहारे अन्न को (अपि) भी (एतु) प्राप्त होवें ॥९॥

भावार्थ : जो अच्छा संस्कार किये रोग हरने और बुद्धि देनेवाले उत्तम अन्न का भोजन कर सन्तोनोत्पत्ति करते हैं, उनके सन्तान विद्वानों के प्रिय दीर्घ आयुवाले और सुशील होते हैं ॥९॥