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Rigveda / 2 / 4 / 7

स यो व्यस्था॑द॒भि दक्ष॑दु॒र्वीं प॒शुर्नैति॑ स्व॒युरगो॑पाः। अ॒ग्निः शो॒चिष्माँ॑ अत॒सान्यु॒ष्णन्कृ॒ष्णव्य॑थिरस्वदय॒न्न भूम॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 4 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : सोमाहुतिर्भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : आर्षीपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर अग्निपरता से ही विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। यः। वि। अस्था॑त्। अ॒भि। धक्ष॑त्। उ॒र्वीं। प॒शुः। न। ए॒ति॒। स्व॒ऽयुः। अगो॑पाः। अ॒ग्निः। शो॒चिष्मा॑न्। अ॒त॒सानि॑। उ॒ष्णन्। कृ॒ष्णऽव्य॑थिः। अ॒स्व॒द॒य॒त्। न। भूम॑॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (भूम) बहुताई के साथ (व्यस्थात्) विविध प्रकार से स्थित होता है (स्वयुः) जो आप जाता अर्थात् बिना चैतन्य पदार्थ के भी चैतन्य के समान गति देता है। (अगोपाः) पालना करनेवाले गुणों से रहित पदाथों को अपने प्रताप से सन्ताप देनेवाला (पशुः) पशु के (न) समान (एति) जाता है। (उर्वीम्) और भूमि को (अभिदक्षत्) सब ओर से जलाता है। (सः) वह (शोचिष्मान्) बहुत लपटोंवाला (कृष्णव्यथिः) पदार्थों के अंशों को खींचने और उनको व्यथित करनेवाला (अग्निः) अग्नि (अतसानि) निरन्तर जानेवाले त्रसरेणु आदि पदार्थों को (उष्णन्) जलाता और (अस्वदयत्) स्वादिष्ठ करता हुआ (न) सा वर्त्तमान है ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पृथिवी आदि पदार्थों में व्यवस्था को प्राप्त मूर्त्तिमान् पदार्थों का जलानेवाला रक्षकरहित पशु के समान आप जानेवाला प्रकाशमय अग्नि अपने तेज से विथरे हुए त्रसरेणुओं को भी सब ओर से तपाता है, वह अग्नि बलिष्ठ है, यह जानना चाहिये ॥७॥