Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 5 / 7

स्वः स्वाय॒ धाय॑से कृणु॒तामृ॒त्विगृ॒त्विज॑म्। स्तोमं॑ य॒ज्ञं चादरं॑ व॒नेमा॑ ररि॒मा व॒यम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 5 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : सोमाहुतिर्भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिगुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : स्वः। स्वाय॑। धाय॑से। कृ॒णु॒ताम्। ऋ॒त्विक्। ऋ॒त्विज॑म्। स्तोम॑म्। य॒ज्ञम्। च॒। आत्। अर॑म्। व॒नेम॑। र॒रि॒म। व॒यम्॥

पदार्थ : जैसे (स्वः) आप (स्वाय) अपने (धायसे) करनेवाले स्वभाव के लिये (कृणुताम्) किसी काम को करें वा (त्विक्) तुओं के अनुकूल सब व्यवहारों की प्राप्ति कराता हुआ (त्विजम्) दूसरों को अपने अनुकूल वा (स्तोमम्) स्तुति प्रशंसा के योग्य व्यवहार (यज्ञम्, च) और यज्ञ को करे वैसे (वयम्) हम लोग (ररिम) रमें (आत्) और (अरम्) परिपूर्ण (वनेम) अच्छे प्रकार सब पदार्थों का सेवन करें ॥७॥

भावार्थ : जैसे आप अपने हित के लिये प्रवृत्त हों वा विद्वान् जन विद्वानों और यज्ञ करनेवाले विविध प्रकार के क्रियायज्ञ को सिद्ध करते हैं, वैसे हमलोग भी प्रवृत्त हों ॥७॥