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Rigveda / 2 / 9 / 2

त्वं दू॒तस्त्वमु॑ नः पर॒स्पास्त्वं वस्य॒ आ वृ॑षभ प्रणे॒ता। अग्ने॑ तो॒कस्य॑ न॒स्तने॑ त॒नूना॒मप्र॑युच्छ॒न्दीद्य॑द्बोधि गो॒पाः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 9 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : त्वम्। दू॒तः। त्वम्। ऊँ॒ इति॑। नः॒। प॒रः॒ऽपाः। त्वम्। वस्यः॑। आ। वृ॒ष॒भ॒। प्र॒ऽने॒ता। अग्ने॑। तो॒कस्य॑। नः॒। तने॑। त॒नूना॑म्। अप्र॑ऽयुच्छन्। दीद्य॑त्। बो॒धि॒। गो॒पाः॥

पदार्थ : हे (वृषभ) बलवान् (अग्ने) अग्नि के समान विद्वान् ! (त्वम्) आप (नः) हमारे (दूतः) देशान्तर पहुँचानेवाले (त्वम्) आप (उ) ही (परस्पाः) सबसे पार और रक्षा करनेवाले (त्वम्) आप (वस्यः) निवास करने योग्य (तोकस्य) सन्तान को (आ,प्रणेता) सब ओर से अच्छे प्रकार समस्त गुणों को प्रवृत्त करानेहारे (नः) हम लोगों के (तनूनाम्) शरीरों के (तने) विस्तार में (अप्रयुच्छन्) न प्रमाद कराते हुए (गोपाः) शरीर की रक्षा करनेवाले (दीद्यत्) सब विषयों को प्रकाश कराते (बोधि) और जानते हो ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य, अग्नि प्रयोग से प्रेरणा दी हुई नौका समुद्र से पार जैसे पहुँचाती, वैसे दुःखरूपी समुद्र से पार करते हैं, सन्तानों की शिक्षा में और शरीरों की रक्षा करने में प्रवीण और प्रमाद को छोड़ धर्म के अनुष्ठान करनेवाले हैं, वे यहाँ आभ्युदयिक सुख को प्राप्त होते हैं ॥२॥