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Rigveda / 2 / 10 / 2

श्रू॒या अ॒ग्निश्चि॒त्रभा॑नु॒र्हवं॑ मे॒ विश्वा॑भिर्गी॒र्भिर॒मृतो॒ विचे॑ताः। श्या॒वा रथं॑ वहतो॒ रोहि॑ता वो॒तारु॒षाह॑ चक्रे॒ विभृ॑त्रः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 10 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वानों को अग्निविद्या ग्रहण का उपदेश किया जाता है।

पदपाठ : श्रू॒याः। अ॒ग्निः। चि॒त्रऽभा॑नुः। हव॑म्। मे॒। विश्वा॑भिः। गीः॒ऽभिः। अ॒मृतः॑। विऽचे॑ताः। श्या॒वा। रथ॑म्। व॒ह॒तः॒। रोहि॑ता। वा॒। उ॒त। अ॒रु॒षा। अह॑। च॒क्रे॒। विऽभृ॑त्रः॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! आप जो (चित्रभानुः) चित्र-विचित्र दीप्तिवाला (अमृतः) मृत्युधर्मरहित (विचेताः) विविध प्रकार का ज्ञान जिससे होता है (विभृतः) और जो नाना प्रकार पदार्थों से धारण करनेवाला (अग्निः) अग्नि है। जिसके सम्बन्ध के (रथम्) रथ को सवितृमण्डलस्थ (रोहिता) ललामी आदि गुण के लिये (उत) और (अरुषा) मर्मस्थलों में व्याप्त होने और (श्यावा) सब विषयों की प्राप्ति करानेवाले धारण और आकर्षण गुण (वहतः) एक देश से दूसरे देश को पहुँचाते हैं (वा) अथवा (अह) निश्चय से उसको (चक्रे) शिल्पीजन बनाता है, उसकी विद्या के उपदेश को (मे) मेरी (विश्वाभिः) समस्त (गीर्भिः) वाणियों से (श्रूयाः) सुनिये ॥२॥

भावार्थ : मनुष्य जिससे बिजुली आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, सबका जीवन भी होता है, उस अग्नि की विद्या को सब उपायों से ग्रहण करें ॥२॥