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Rigveda / 2 / 10 / 4

जिघ॑र्म्य॒ग्निं ह॒विषा॑ घृ॒तेन॑ प्रतिक्षि॒यन्तं॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। पृ॒थुं ति॑र॒श्चा वय॑सा बृ॒हन्तं॒ व्यचि॑ष्ठ॒मन्नै॑ रभ॒सं दृशा॑नम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 10 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : जिघ॑र्मि। अ॒ग्निम्। ह॒विषा॑। घृ॒तेन॑। प्र॒ति॒ऽक्षि॒यन्त॑म्। भुव॑नानि। विश्वा॑। पृ॒थुम्। ति॒र॒श्चा। वय॑सा। बृ॒हन्त॑म्। व्यचि॑ष्ठम्। अन्नैः॑। र॒भ॒सम्। दृशा॑नम्॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जैसे (विश्वा) समग्र (भुवनानि) जिनमें प्राणी उत्पन्न होते हैं उन लोकों और (प्रतिक्षियन्तम्) पदार्थ-पदार्थ के प्रति वसते हुए (तिरश्चा) तिरछे सब पदार्थों में वांकेपन से रहनेवाले (वयसा) मनोहर जीवन के साथ (पृथुम्) बढ़े हुए (बृहन्तम्) वा बढ़ते हुए (व्यचिष्ठम्) अतीव सब पदार्थों में व्याप्त और (अन्नैः) पृथिव्यादिकों के साथ (रसभम्) वेगवान् (दृशानम्) देखा जाता वा अपने से अन्य पदार्थों को दिखानेवाले (अग्निम्) अग्नि को मैं (हविषा) होमने योग्य सुगन्धि आदि पदार्थ वा (घृतेन) घी से मैं (जिघर्मि) प्रदीप्त करता हूँ, वैसे आप भी कीजिये ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य समस्त मूर्तिमान् पदार्थों में ठहरे हुए बिजुलीरूप अग्नि को साधनों से अच्छे प्रकार ग्रहण कर इसमें सुगन्धि आदि पदार्थ का होम करते हैं, वे अनन्त सुख को प्राप्त होते हैं ॥४॥