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Rigveda / 2 / 11 / 1

श्रु॒धी हव॑मिन्द्र॒ मा रि॑षण्यः॒ स्याम॑ ते दा॒वने॒ वसू॑नाम्। इ॒मा हि त्वामूर्जो॑ व॒र्धय॑न्ति वसू॒यवः॒ सिन्ध॑वो॒ न क्षर॑न्तः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 11 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब इक्कीस ॠचावाले ग्यारहवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजधर्म का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : श्रु॒धि। हव॑म्। इ॒न्द्र॒। मा। रि॒ष॒ण्यः॒। स्याम॑। ते॒। दा॒वने॑। वसू॑नाम्। इ॒माः। हि। त्वाम्। ऊर्जः॑। व॒र्धय॑न्ति। व॒सु॒ऽयवः॑। सिन्ध॑वः। न। क्षर॑न्तः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) बिजुली के समान प्रचण्ड प्रतापवाले राजन् ! जिन (त्वा) आपको (वसूनाम्) प्रथम कक्षा के विद्वान् वा पृथिवी आदि के (हि) निश्चय के साथ (इमाः) ये (ऊर्जः) पराक्रम वा अन्नादि पदार्थ और (वसूयवः) अपने को धनों की इच्छा करनेवाले (क्षरन्तः) कम्पित करते और चेष्टावान् करते हुए (सिन्धवः) समुद्रों के (न) समान (वर्द्धयन्ति) बढ़ाते हैं जिन (ते) आपके (दावने) दान के लिये हम (स्याम) हों सो आप हम लोगों को (मा,रिषण्यः) मत मारिये और (हवम्) शास्त्रबोधजन्य शब्द (श्रुधि) सुनिये ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे समुद्र जल से सबको बढ़ाता है, वैसे प्रधान पुरुषों को चाहिये कि अपने आश्रित सब जनों को दान और मान से बढ़ावें ॥१॥