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Rigveda / 2 / 11 / 8

नि पर्व॑तः सा॒द्यप्र॑युच्छ॒न्त्सं मा॒तृभि॑र्वावशा॒नो अ॑क्रान्। दू॒रे पा॒रे वाणीं॑ व॒र्धय॑न्त॒ इन्द्रे॑षितां ध॒मनिं॑ पप्रथ॒न्नि॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 11 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : नि। पर्व॑तः। सा॒दि॒। अप्र॑ऽयुच्छन्। सम्। मा॒तृऽभिः॑। वा॒व॒शा॒नः। अ॒क्रा॒न्। दू॒रे। पा॒रे। वाणी॑म्। व॒र्धय॑न्तः। इन्द्र॑ऽइषिताम्। ध॒मनि॑म्। प॒प्र॒थ॒न्। नि॥

पदार्थ : जो (मातृभिः) मान करनेवाली माता आदि से (वावशानः) कामना किया जाता और (अप्रयुच्छन्) प्रमाद न करता हुआ (पर्वतः) मेघ के समान विद्वानों ने (सम्,सादि) अच्छे प्रकार सिद्ध किया उसके साथ जो दोषों को (दूरे) दूर करते हुए (वाणीम्) सुन्दर शिक्षायुक्त वाणी को (पारे) समुद्र की भूमियों के परभाग में (वर्द्धयन्तः) बढ़ाते हुए औरों को विद्वान् (अक्रान्) करते हैं वे (इन्द्रेषिताम्) परमेश्वर की भेजी हुई वेदवाणी का (नि,पप्रथन्) निरन्तर विस्तार करें ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिन सन्तानों को माता उत्तम शिक्षा और विद्या से प्रमादरहित कर बढ़ाती हैं, वे सुखों को प्राप्त होकर सब ओर से बढ़ते हैं ॥८॥