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Rigveda / 2 / 11 / 17

उ॒ग्रेष्विन्नु शू॑र मन्दसा॒नस्त्रिक॑द्रुकेषु पाहि॒ सोम॑मिन्द्र। प्र॒दोधु॑व॒च्छ्मश्रु॑षु प्रीणा॒नो या॒हि हरि॑भ्यां सु॒तस्य॑ पी॒तिम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 11 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : उ॒ग्रेषु॑। इत्। नु। शू॒र॒। म॒न्द॒सा॒नः। त्रिऽक॑द्रुकेषु। पा॒हि॒। सोम॑म्। इ॒न्द्र॒। प्र॒ऽदोधु॑वत्। श्मश्रु॑षु। प्री॒णा॒नः। या॒हि। हरि॑ऽभ्याम्। सु॒तस्य॑। पी॒तिम्॥

पदार्थ : हे (शूर) दुष्टों की हिंसा करने और (इन्द्र) वैद्य विद्या जाननेवाले ! आप (त्रिकद्रुकेषु) जिन व्यवहारों में तीन अर्थात् शरीर, आत्मा और मन की पीड़ा विद्यमान उनके निमित्त (सोमम्) महान् ओषधियों के समूह की (पाहि) रक्षा करो और (उग्रेषु) तेजस्वी प्रबल प्रतापवालों में (इत्) ही (मन्दसानः) कामना और (प्रदोधुवत्) उत्तमता से कम्पन अर्थात् नाना प्रकार की चेष्टा करते और (श्मश्रुषु) चिबुकादिक अङ्गों में (प्रीणानः) तृप्ति पाते हुए (हरिभ्याम्) अच्छे शिक्षित घोड़ों से (सुतस्य) निकले हुए ओषधियों के रस के (पीतिम्) पीने को (याहि) प्राप्त होओ ॥१७॥

भावार्थ : जो मनुष्य प्रबल बुद्धिजनों के साथ अच्छे प्रकार कार्यों का प्रयोग करते हैं तो शत्रुओं को कंपाते ओर बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को पीवते हुए अच्छे सिखाये हुए घोड़ों से युक्त रथ से जैसे वैसे शीघ्र सुखों को प्राप्त होते हैं ॥१७॥