Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 12 / 2

यः पृ॑थि॒वीं व्यथ॑माना॒मदृं॑ह॒द्यः पर्व॑ता॒न्प्रकु॑पिताँ॒ अर॑म्णात्। यो अ॒न्तरि॑क्षं विम॒मे वरी॑यो॒ यो द्यामस्त॑भ्ना॒त्स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 12 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यः। पृ॒थि॒वीम्। व्यथ॑मानाम्। अदृं॑हत्। यः। पर्व॑तान्। प्रऽकु॑पितान्। अर॑म्णात्। यः। अ॒न्तरि॑क्षम्। वि॒ऽम॒मे। वरी॑यः। यः। द्याम्। अस्त॑भ्नात्। सः। ज॒ना॒सः॒। इन्द्रः॑॥

पदार्थ : हे (जनासः) विद्वानो ! (यः) जो (व्यथमानाम्) चलती हुई (पृथिवीम्) पृथिवी को (अदृंहत्) धारण करता है (यः) जो (प्रकुपितान्) अत्यन्त कोपयुक्त शत्रुओं के समान वर्त्तमान (पर्वतान्) मेघों को (अरम्णात्) छिन्न-भिन्न करता (यः) जो (वरीयः) अत्यन्त बहुत विस्तारवाले (अन्तरिक्षम्) पृथिव्यादि दो-दो लोकों के बीच भाग का (विममे) विशेषता से मान करता है (यः) जो (द्याम्) प्रकाश को (अस्तभ्नात्) धारण करता है (सः) वह (इन्द्रः) सब पदार्थों को अपने प्रताप से छिन्न-भिन्न करनेवाला सूर्य जानने योग्य है ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो ईश्वर बिजुली वा सूर्य को न रचे तो चलते हुए बड़े-बड़े भूगोलों को कौन धारण करे, कौन मेघ को वर्षावे और कौन अन्तरिक्ष को अपने प्रकाश से पूरित करे ॥२॥