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Rigveda / 2 / 12 / 11

यः शम्ब॑रं॒ पर्व॑तेषु क्षि॒यन्तं॑ चत्वारिं॒श्यां श॒रद्य॒न्ववि॑न्दत्। ओ॒जा॒यमा॑नं॒ यो अहिं॑ ज॒घान॒ दानुं॒ शया॑नं॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 12 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यः। शम्ब॑रम्। पर्व॑तेषु। क्षि॒यन्त॑म्। च॒त्वा॒रिं॒श्याम्। श॒रदि॑। अ॒नु॒ऽअवि॑न्दत्। ओ॒जा॒यमा॑नम्। यः। अहि॑म्। ज॒घान॑। दानु॑म्। शया॑नम्। सः। ज॒ना॒सः॒। इन्द्रः॑॥

पदार्थ : हे (जनासः) बुद्धिमान् मनुष्यो ! तुमको (यः) जो (पर्वतेषु) बद्दलों में (चत्वारिंश्याम्) चालीसवीं (शरदि) शरद तु में (क्षियन्तम्) निवास करते हुए (शम्बरम्) मेघ को (अन्वविन्दत्) अनुकूलता से प्राप्त होता और (यः) जो (दानुम्) देनेवाले (शयानम्) तथा सोते हुए के समान वर्त्तमान (अहिम्) मेघ को (जघान) मारता है (सः) वह (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् सूर्य जानना चाहिये ॥११॥

भावार्थ : जो चालीस वर्ष पर्यन्त वर्षा न हो तो कौन प्राण धर सके। जो सूर्य जल को न खींचे, न धारण करे और न वर्षावे तो कौन बल पाने को योग्य हो ॥११॥