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Rigveda / 2 / 13 / 8

यो ना॑र्म॒रं स॒हव॑सुं॒ निह॑न्तवे पृ॒क्षाय॑ च दा॒सवे॑शाय॒ चाव॑हः। ऊ॒र्जय॑न्त्या॒ अप॑रिविष्टमा॒स्य॑मु॒तैवाद्य पु॑रुकृ॒त्सास्यु॒क्थ्यः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 13 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यः। ना॒र्म॒रम्। स॒हऽव॑सुम्। निऽह॑न्तवे। पृ॒क्षाय॑। च॒। दा॒सऽवे॑शाय॒। च॒। अव॑हः। ऊ॒र्जय॑न्त्याः। अप॑रिऽविष्टम्। आ॒स्य॑म्। उ॒त। ए॒व। अ॒द्य। पु॒रु॒ऽकृ॒त्। सः। अ॒सि॒। उ॒क्थ्यः॑॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (पुरुकृत्) बहुत वस्तुओं को करनेवाला सेनापति विद्वान् (दासवेशाय) जिसमें सेवक प्रवेश करते उसके लिये और (पृक्षाय) सेचन करने के लिये (च) भी (सहवसुम्) धनादि पदार्थों के साथ वर्त्तमान (नार्मरम्) मनुष्यों को मरवा देनेवाले पवन सम्बन्धि अग्नि को (अवहः) प्राप्त होता है जिससे (आस्यम्) मुख (अपरिविष्टम्) परिवेष परसने के कर्म से रहित हुआ हो (उत) और (ऊर्जयन्त्याः) बलवती सामग्रियों में उत्तम जल (च) भी विद्यमान है (सः,एव) वही सेनापति (अद्य) आज (उक्थ्यः) कथनीय पदार्थों में (असि) है, यह तुम लोग जानो ॥८॥

भावार्थ : जो राजजन भृत्यों को और सेवकों को श्रेष्ठ भोजनादिक देकर आनन्दित करते हैं, वे स्तुति सेवनेवाले होकर बहुत भोगों को प्राप्त होते हैं ॥८॥