Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 14 / 2

अध्व॑र्यवो॒ यो अ॒पो व॑व्रि॒वांसं॑ वृ॒त्रं ज॒घाना॒शन्ये॑व वृ॒क्षम्। तस्मा॑ ए॒तं भ॑रत तद्व॒शायँ॑ ए॒ष इन्द्रो॑ अर्हति पी॒तिम॑स्य॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 14 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब बिजुली के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अध्व॑र्यवः। यः। अ॒पः। व॒व्रि॒वांस॑म्। वृ॒त्रम्। ज॒घान॑। अ॒शन्या॑ऽइव। वृ॒क्षम्। तस्मै॑। ए॒तम्। भ॒र॒त॒। त॒त्ऽव॒शाय॑। ए॒षः। इन्द्रः॑। अ॒र्ह॒ति॒। पी॒तिम्। अ॒स्य॒॥

पदार्थ : हे (अध्वर्यवः) अपने को अहिंसा की इच्छा करनेवालो ! (यः) जो सूर्य (वव्रिवांसम्) आवरण करनेवाले (वृत्रम्) मेघ को (अशन्येव) बिजुली के समान (वृक्षम्) वृक्ष को (जघान) मारता है अर्थात् दाहशक्ति से भस्म कर देता है और (आपः) जलों को वर्षाता तथा जो (एषः) यह (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् जन (अस्य) सोमलतादि रस के (पीतिम्) पीने को (अर्हति) योग्य होता है इस कारण (तद्वशाय) उन उन पदार्थों की कामना करनेवाले के लिये (एतम्) उक्त पदार्थ द्वय को धारण करो अर्थात् उनके गुणों को अपने मन से निश्चित करो ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं । जो सूर्य के समान विद्या और मेघ के समान सुख की उत्पत्ति करते हैं और सदा पथ्योषधि सेवी हुए ओषधियों का सेवन करते हैं, वे परोपकार करने को भी योग्य होते हैं ॥२॥