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Rigveda / 2 / 15 / 5

स ईं॑ म॒हीं धुनि॒मेतो॑ररम्णा॒त्सो अ॑स्ना॒तॄन॑पारयत्स्व॒स्ति। त उ॒त्स्नाय॑ र॒यिम॒भि प्र त॑स्थुः॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 15 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। ई॒म्। म॒हीम्। धुनि॑म्। एतोः॑। अ॒र॒म्णा॒त्। सः। अ॒स्ना॒तॄन्। अ॒पा॒र॒य॒त्। स्व॒स्ति। ते। उ॒त्ऽस्नाय॑। र॒यिम्। अ॒भि। प्र। त॒स्थुः॒। सोम॑स्य। ता। मदे॑। इन्द्रः॑। च॒का॒र॒॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमेश्वर (सोमस्य) उत्पन्न जगत् के बीच (ईम्) जल और (धुनिम्) चलती हुई (महीम्) पृथिवी को (अरम्णात्) हन्ता है (सः) वह (अस्नातॄन्) अस्नातक अर्थात् जो यज्ञ स्नान नहीं किये उनके (एतोः) गमन को (स्वस्ति) कल्याण जैसे हो वैसे (अभि, अपारयत्) सब ओर से पार पहुँचाता है जो (ता) उक्त कामों को (मदे) हर्ष के निमित्त (चकार) करता है और जो विद्वान् जन उक्त ईश्वर के निमित्त (उत्स्नाय) उत्तम समाधिस्नान कर (रयिम्) धनको (प्रतस्थुः) प्रस्थित करते फिरते (ते) वे दुःख को छोड़ते वह सबको सेवने योग्य है ॥५॥

भावार्थ : जो जगदीश्वर जगत् का रचने वा पालना करने वा हननेवाला और मुक्ति में शुद्धाचरण करनेवालों को दुःख से पार करनेवाला है, जो इस शुद्ध ईश्वर में समाधि से न्हाय (स्नानकर) के पवित्र होते हैं, वे सब जगत् में सब जगह प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं ॥५॥