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Rigveda / 2 / 17 / 5

स प्रा॒चीना॒न्पर्व॑तान्दृंह॒दोज॑साधरा॒चीन॑मकृणोद॒पामपः॑। अधा॑रयत्पृथि॒वीं वि॒श्वधा॑यस॒मस्त॑भ्नान्मा॒यया॒ द्याम॑व॒स्रसः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 17 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। प्रा॒चीना॑न्। पर्व॑तान्। दृं॒ह॒त्। ओज॑सा। अ॒ध॒रा॒चीन॑म्। अ॒कृ॒णो॒त्। अ॒पाम्। अपः॑। अधा॑रयत्। पृ॒थि॒वीम्। वि॒श्वऽधा॑यसम्। अस्त॑भ्नात्। मा॒यया॑। द्याम्। अ॒व॒ऽस्रसः॑॥

पदार्थ : (सः) वह परमेश्वर जैसे (प्राचीनान्) प्राचीन अर्थात् पहिले से वर्त्तमान (पर्वतान्) पर्वतों के समान मेघों को (ओजसा) बल के साथ (दृंहत्) धारण करता (अधराचीनम्) और जो नीचे को प्राप्त होता उसको बनाकर (अपाम्) अन्तरिक्ष के (अपः) जलों को (अकृणोत्) सिद्ध करता है (विश्वधायसम्) विश्वके धारण करने को समर्थ (पृथिवीम्) पृथिवी को (अधारयत्) धारण करता जो (मायया) प्रज्ञा से (द्याम्) प्रकाश को (अस्तभ्नात्) रोकता वा (अवस्रसः) विस्तारता है, वैसे समस्त विश्व को धारण करता है ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने निकट के लोकों को धारण करता, वैसे परमेश्वर सूर्य्यादि समस्त जगत् को धारण करता है ॥५॥