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Rigveda / 2 / 18 / 8

न म॒ इन्द्रे॑ण स॒ख्यं वि यो॑षद॒स्मभ्य॑मस्य॒ दक्षि॑णा दुहीत। उप॒ ज्येष्ठे॒ वरू॑थे॒ गभ॑स्तौ प्रा॒येप्रा॑ये जिगी॒वांसः॑ स्याम॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 18 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब ईश्वर और विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा गया है।

पदपाठ : न। मे॒। इन्द्रे॑ण। स॒ख्यम्। वि। यो॒ष॒त्। अ॒स्मभ्य॑म्। अ॒स्य॒। दक्षि॑णा। दु॒ही॒त॒। उप॑। ज्येष्ठे॑। वरू॑थे। गभ॑स्तौ। प्रा॒येऽप्रा॑ये। जि॒गी॒वांसः॑। स्या॒म॒॥

पदार्थ : जिस (अस्य) इस (दक्षिणा) विद्या और सुन्दर शिक्षा का दान (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (ज्येष्ठे) प्रशंसा योग्य (वरूथे) अतीव उत्तम (गभस्तौ) विज्ञान प्रकाश में (प्रायेप्राये) और मनोहर-मनोहर परमेश्वर वा आप्त विद्वान् में (उप,दुहीत) परिपूर्ण होती हो उस (इन्द्रेण) उक्त परमेश्वर वा आप्त विद्वान् से मेरी (सख्यम्) मित्रता जैसे (न,वियोषत्) न विनष्ट हो वैसे हो जिससे हम लोग (जिगीवांसः) विजयशील (स्याम) हों ॥८॥

भावार्थ : जो सत्य प्रेम से जगदीश्वर वा आप्त विद्वानों को प्राप्त होने और सेवन करने की कामना करते हैं और उसके विरोध की इच्छा नहीं चाहते हैं, वे विद्वान् होकर ज्येष्ठ होते हैं अर्थात् अति प्रशंसित होते हैं ॥८॥