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Rigveda / 2 / 19 / 2

अ॒स्य म॑न्दा॒नो मध्वो॒ वज्र॑ह॒स्तोऽहि॒मिन्द्रो॑ अर्णो॒वृतं॒ वि वृ॑श्चत्। प्र यद्वयो॒ न स्वस॑रा॒ण्यच्छा॒ प्रयां॑सि च न॒दीनां॒ चक्र॑मन्त॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 19 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब सूर्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒स्य। म॒न्दा॒नः। मध्वः॑। वज्र॑ऽहस्तः। अहि॑म्। इन्द्रः॑। अ॒र्णः॒ऽवृत॑म्। वि। वृ॒श्च॒त्। प्र। यत्। वयः॑। न। स्वस॑राणि। अच्छ॑। प्रयां॑सि। च॒। न॒दीना॑म्। चक्र॑मन्त॥

पदार्थ : हे मनुष्यो (यत्) जिससे (वयः) पखेरुओं के (न) समान (स्वसराणि) दिनों को (नदीनां प्रयांसि च) और नदियों के मनोहर स्रोतों को (अच्छ) अच्छे प्रकार (प्रचक्रमन्त) रमते हैं जो (वज्रहस्तः) किरणरूपी हाथोंवाला (अस्य) इस (मध्वः) विशेषकर जानने योग्य जगत् के बीच (मन्दानः) प्राप्त हुआ (इन्द्रः) सूर्य (अर्णोवृतम्) जिसमें जल विद्यमान हैं उस (अहिम्) मेघ को (विवृश्चत्) विभिन्न करता है उसको यथावत् जानो ॥२॥

भावार्थ : जैसे पक्षी जाते आते हैं, वैसे रात्रि दिन वर्त्तमान हैं। जैसे सूर्य इस जगत् का आनन्द देनेवाला है, वैसे सज्जनों को वर्त्तना चाहिये ॥२॥