Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 19 / 7

ए॒वा त॑ इन्द्रो॒चथ॑महेम श्रव॒स्या न त्मना॑ वा॒जय॑न्तः। अ॒श्याम॒ तत्साप्त॑माशुषा॒णा न॒नमो॒ वध॒रदे॑वस्य पी॒योः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 19 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब विद्वान् के विषय को इस मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : ए॒व। ते॒। इ॒न्द्र॒। उ॒चथ॑म्। अ॒हे॒म॒। श्र॒व॒स्या। न। त्मना॑। वा॒जय॑न्तः। अ॒श्याम॑। तत्। साप्त॑म्। आ॒शु॒षा॒णाः। न॒नमः॑। वधः॑। अदे॑वस्य। पी॒योः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) विद्वान् (ते) आपके (त्मना) आत्मा से (वाजयन्तः) ज्ञान कराते हुए हम लोग (श्रवस्या) श्रवण करने योग्य पदार्थ के (न) समान (उचथम्) और कहने योग्य प्रस्ताव (एव) ही को (अहेम) व्याप्त हों तथा (आशुषाणाः) शीघ्रता करते हुए हम लोग (तत्) उस (साप्तम्) सात प्रकार के विषय को (अश्याम) व्याप्त हों (अदेवस्य) अविद्वान् (पीयोः) पालना करनेवाले सूर्य को (वधः) वध करनेवाले शस्त्र को व्याप्त हों और परमेश्वर को (ननमः) नमस्कार करें ॥७॥

भावार्थ : जो मनुष्य कहने योग्य को कहें, पाने योग्य को पावें, नमने योग्य को नमें, मारने योग्य को मारें और जानने योग्य को जानें, वे ही आप्त होते हैं ॥७॥