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Rigveda / 2 / 20 / 2

त्वं न॑ इन्द्र॒ त्वाभि॑रू॒ती त्वा॑य॒तो अ॑भिष्टि॒पासि॒ जना॑न्। त्वमि॒नो दा॒शुषो॑ वरू॒तेत्थाधी॑र॒भि यो नक्ष॑ति त्वा॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 20 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को इस मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : त्वम्। नः॒। इ॒न्द्र॒। त्वाभिः॑। ऊ॒ती। त्वा॒ऽय॒तः। अ॒भि॒ष्टि॒ऽपा। अ॒सि॒। जना॑न्। त्वम्। इ॒नः। दा॒शुषः॑। व॒रू॒ता। इ॒त्थाऽधीः॑। अ॒भि। यः। नक्ष॑ति। त्वा॒॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त विद्वान् (यः) जो (वरूता) स्वीकार करनेवाला (इत्थाधीः) इस हेतु से धारणावाली हुई है बुद्धि जिसकी वह जन (त्वा) आपको (अभि,नक्षति) सन्मुख प्राप्त होता वह (इनः) समर्थ (त्वायतः) आपकी कामना करते हुए (दाशुषः) देनेवाले (जनान्) जनों को और (नः) हमलोगों को पाले रखे (त्वम्) आप भी रक्षा करें और जिस कारण से (त्वम्) आप (अभिष्टिपा) अभिकाङ्क्षा के पालनेवाले (असि) हैं इसी कारण (त्वाभिः) आपकी (ऊती) रक्षाओं के सहित हमलोग सुख को अच्छे प्रकार धारण करते हैं ॥२॥

भावार्थ : पिछले मन्त्र से (सुम्नम्) और (प्रभरामहे) इन दोनों पदों की अनुवृत्ति है। जो विद्वानों को प्राप्त होकर प्राणियों के सुख की कामना करते हैं, वे दाता होते हैं ॥२॥