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Rigveda / 2 / 22 / 4

तव॒ त्यन्नर्यं॑ नृ॒तोऽप॑ इन्द्र प्रथ॒मं पू॒र्व्यं दि॒वि प्र॒वाच्यं॑ कृ॒तम्। यद्दे॒वस्य॒ शव॑सा॒ प्रारि॑णा॒ असुं॑ रि॒णन्न॒पः। भुव॒द्विश्व॑म॒भ्यादे॑व॒मोज॑सा वि॒दादूर्जं॑ श॒तक्र॑तुर्वि॒दादिष॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 22 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिगतिशक्वरी | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब जीव विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : तव॑। त्यत्। नर्य॑म्। नृ॒तो॒ इति॑। अपः॑। इ॒न्द्र॒। प्र॒थ॒मम्। पू॒र्व्यम्। दि॒वि। प्र॒ऽवाच्य॑म्। कृ॒तम्। यत्। दे॒वस्य॑। शव॑सा। प्र। अरि॑णा। असु॑म्। रि॒णन्। अ॒पः। भुव॑त्। विश्व॑म्। अ॒भि। अदे॑वम्। ओज॑सा। वि॒दात्। ऊर्ज॑म्। श॒तऽक्र॑तुः। वि॒दात्। इष॑म्॥

पदार्थ : हे (नृतो) सबके नचानेवाले (इन्द्र) इन्द्रियादि ऐश्वर्ययुक्त वा उसका भोक्ता (यत्) जो तू (त्यत्) वह (प्रथमम्) प्रथम (पूर्व्यम्) पूर्वाचार्यों ने किया (प्रवाच्यम्) उत्तमता से कहने योग्य (कृतम्) प्रसिद्ध (नर्य्यम्) मनुष्यों में सिद्ध पदार्थ उसको और (दिवि) प्रकाशमय परमेश्वर में (प्रारिणाः) प्राप्त होता और (असुम्) प्राण और (अपः) जलों को (रिणन्) प्राप्त होता हुआ (ओजसा) जल से (अदेवम्) जिसमें प्रकाश नहीं विद्यमान उस (विश्वम्) समस्त वस्तुमात्र को (अभि,विदात्) प्राप्त हो (शतक्रतुः) असंख्य प्रज्ञायुक्त आप (ऊर्जम्) पराक्रम और (इषम्) अन्न को (विदात्) प्राप्त हो उन (तव) आपके सुख (भुवत्) हो ॥४॥

भावार्थ : हे जीवो! जिस परमेश्वर के निबन्ध से तुम शरीर इन्द्रियों और प्राणों को प्राप्त हुए, उसको सर्व सामर्थ्य से दिन-रात ध्यावो ॥४॥ इस सूक्त में सूर्य्य-विद्युत्-ईश्वर और जीवों के गुण कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त से अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ । यह बाईसवाँ सूक्त और अट्ठाईसवाँ वर्ग और दूसरा अनुवाक समाप्त हुआ ॥