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Rigveda / 2 / 23 / 9

त्वया॑ व॒यं सु॒वृधा॑ ब्रह्मणस्पते स्पा॒र्हा वसु॑ मनु॒ष्या द॑दीमहि। या नो॑ दू॒रे त॒ळितो॒ या अरा॑तयो॒ऽभि सन्ति॑ ज॒म्भया॒ ता अ॑न॒प्नसः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 23 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : त्वया॑। व॒यम्। सु॒ऽवृधा॑। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒। स्पा॒र्हा। वसु॑। म॒नु॒ष्या॑। आ। द॒दी॒म॒हि॒। याः। नः॒। दू॒रे। त॒ळितः॑। याः। अरा॑तयः। अ॒भि। सन्ति॑। ज॒म्भय॑। ताः। अ॒न॒प्नसः॑॥

पदार्थ : (ब्रह्मणः) ब्रह्माण्ड वा राज्य की (पते) पालना करनेवाले (शिक्षक) (स्पार्हा) अभिकांक्षा के योग्य (सुवृधा) जो सुन्दर बढ़ावा देते उन (त्वया) तुम्हारे साथ (वयम्) हम (मनुष्याः) मनुष्य (वसु) विज्ञान वा धन (ददीमहि) देवें (नः) हमारे (दूरे) दूर देश में (याः) जो (तडितः) बिजली और (याः) जो (अनप्नसः) अविद्यमान कर्म वाली क्रिया (अरातयः) न देने की रीतियाँ (सन्ति) हैं (ताः) उनको (अभि,जम्भय) सब ओर से विनाशिये ॥९॥

भावार्थ : यदि विद्वानों के उपदेश को न ग्रहण करें तो मनुष्य दानशील न हों, जो अकर्मठ अर्थात् कर्म नहीं करते कृपण पुरुष और स्त्रीजन हैं, वे बिजली के समान पुरुषार्थयुक्त करने चाहिये ॥९॥