Rigveda / 2 / 23 / 11
अ॒ना॒नु॒दो वृ॑ष॒भो जग्मि॑राह॒वं निष्ट॑प्ता॒ शत्रुं॒ पृत॑नासु सास॒हिः। असि॑ स॒त्य ऋ॑ण॒या ब्र॑ह्मणस्पत उ॒ग्रस्य॑ चिद्दमि॒ता वी॑ळुह॒र्षिणः॑॥
Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 23 | Mantra No : 11
In English:
Seer : gRRitsamadaH shaunakaH | Devta : brahmaNaspatiH | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : anaanudo vRRiShabho jagmiraahava.m niShTaptaa shatru.m pRRitanaasu saasahiH. asi satya RRINayaa brahmaNaspata ugrasya chiddamitaa viiLuharShiNaH.
Component Words : anaanu.adaH. vRRiShabhaH. jagmiH. aa.ahavam. niH.ataptaa. shatrum. pRRitanaasu. sasahiH. asi. satyaH. RRINa.ayaaH. brahmaNaH. pate. ugrasya. chit. damitaa. viiLu.aharShiNaH.
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : अ॒ना॒नु॒ऽदः। वृ॒ष॒भः। जग्मिः॑। आ॒ऽह॒वम्। निःऽत॑प्ता। शत्रु॑म्। पृत॑नासु। स॒स॒हिः। असि॑। स॒त्यः। ऋ॒ण॒ऽयाः। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒। उ॒ग्रस्य॑। चि॒त्। द॒मि॒ता। वी॒ळु॒ऽह॒र्षिणः॑॥
पदार्थ : हे (ब्रह्मणस्पते) वेद के पालनेवाले आप जिससे (अनानुदः) अनानुद अर्थात् जो पीछे देते हैं वे जिस के नहीं विद्यमान वह (वृषभः) श्रेष्ठजन (आहवम्) सङ्ग्रामको (जग्मिः) जानेवाले (पृतनासु) वीरों की सेनाओं में (शत्रुम्) काटने दुःख देनेवाले वैरी को (निष्टप्ता) निरन्तर सन्ताप देने (सासहिः) निरन्तर सहने (णयाः) और ण को प्राप्त होनेवाले (सत्यः) सज्जनों में साधु (वीळुहर्षिणः) जिसको बल से बहुत हर्ष विद्यमान (उग्रस्य) तीव्र को (चित्) ही (दमिता) दमन करनेवाले (असि) हैं उससे प्रशंसनीय होते हैं ॥११॥
भावार्थ : जो देने योग्य पदार्थ को शीघ्र देते, जाने योग्य स्थान को जाते, पाने योग्य पदार्थ को पाते और दण्ड देने योग्य को दण्ड देते हैं, वे सत्य ग्रहण कर सकते हैं ॥११॥
In Sanskrit:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : अ॒ना॒नु॒ऽदः। वृ॒ष॒भः। जग्मिः॑। आ॒ऽह॒वम्। निःऽत॑प्ता। शत्रु॑म्। पृत॑नासु। स॒स॒हिः। असि॑। स॒त्यः। ऋ॒ण॒ऽयाः। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒। उ॒ग्रस्य॑। चि॒त्। द॒मि॒ता। वी॒ळु॒ऽह॒र्षिणः॑॥
पदार्थ : (अनानुदः) येऽनुददति तेऽनुदा न विद्यन्तेऽनुदा यस्य सः (वृषभः) श्रेष्ठः (जग्मिः) गन्ता (आहवम्) सङ्ग्रामम् (निष्टप्ता) नितरां सन्तापप्रदः (शत्रुम्) शातयितारम् (पृतनासु) वीराणां सेनासु (सासहिः) भृशं सोढा (असि) (सत्यः) सत्सु साधुः (णयाः) य णं याति प्राप्नोति सः (ब्रह्मणः) वेदस्य (पते) पालयितः (उग्रस्य) तीव्रस्य (चित्) अपि (दमिता) दमनकर्त्ता (वीळुहर्षिणः) बलेन बहु हर्षो विद्यते यस्य तस्य ॥११॥
अन्वय : हे ब्रह्मणस्पते त्वं यतोऽनानुदो वृषभ आहवं जग्मिः पृतनासु शत्रुं निष्टप्ता सासहिरृणयाः सत्यो वीळुहर्षिण उग्रस्य चिद्दमितासि तस्मात्प्रशस्यो भवसि ॥११॥
भावार्थ : ये दातव्यं तत्क्षणं ददति गन्तव्यं गच्छन्ति प्राप्तव्यं प्राप्तुवन्ति दण्डनीयं दण्डयन्ति ते सत्यं ग्रहीतुं शक्नुवन्ति ॥११॥