Rigveda / 2 / 24 / 1
सेमाम॑विड्ढि॒ प्रभृ॑तिं॒ य ईशि॑षे॒ऽया वि॑धेम॒ नव॑या म॒हा गि॒रा। यथा॑ नो मी॒ढ्वान्त्स्तव॑ते॒ सखा॒ तव॒ बृह॑स्पते॒ सीष॑धः॒ सोत नो॑ म॒तिम्॥
Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 24 | Mantra No : 1
In English:
Seer : gRRitsamadaH shaunakaH | Devta : brahmaNaspatiH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : semaamaviDDhi prabhRRiti.m ya iishiShe.ayaa vidhema navayaa mahaa giraa. yathaa no miiDhvaantstavate sakhaa tava bRRihaspate siiShadhaH sota no matim.
Component Words : saH. imaam. aviDDhi. pra.abhRRitim. yaH. iishiShe. ayaa. vidhema. navayaa. mahaa. giraa. yathaa. naH. miiDhvaan. stavate. sakhaa. tava. bRRihaspate. siisadhaH. saH. uta. naH. matim.
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : अब द्वितीयाष्टक के सातवें अध्याय का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : सः। इ॒माम्। अ॒वि॒ड्ढि॒। प्रऽभृ॑तिम्। यः। ईशि॑षे। अ॒या। वि॒धे॒म॒। नव॑या। म॒हा। गि॒रा। यथा॑। नः॒। मी॒ढ्वान्। स्तव॑ते। सखा॑। तव॑। बृह॑स्पते। सीस॑धः। सः। उ॒त। नः॒। म॒तिम्॥
पदार्थ : हे (बृहस्पते) अध्यापक वेदरूप वाणी के शिक्षक विद्वान् (यः) जो आप (अया) इस (नवया) नवीन (महा,गिरा) महती उपदेशरूप वाणी से (इमाम्) इस (प्रभृतिम्) धारण वा पोषण रूप क्रिया के करने को (ईशिषे) समर्थ हो (सः) सो आप इस उक्त क्रिया को (अविड्ढि) प्राप्त हूजिये (यथा) जैसे (तव) आपका (मीढ्वान्) विद्या का प्रवर्तक (सखा) मित्र (नः) हमारी (स्तवते) प्रशंसा करता और जैसे (सः) वह आप (नः) हमारे लिये (मतिम्) बुद्धि को (उत) भी (सीषधः) सिद्ध करो वैसे आपको आपके मित्र को हम लोग (विधेम) प्राप्त हों ॥१॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो लोग विद्या की उन्नति करना चाहें, वे प्रथम वेदादि शास्त्रों को स्वयं पढ़के दूसरों को प्रयत्न के साथ पढावें और पढ़ पढ़ा के पदार्थविज्ञान में आरूढ़ बुद्धि को प्राप्त हों ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : अथ विद्वांसः किं कुर्युरित्याह।
पदपाठ : सः। इ॒माम्। अ॒वि॒ड्ढि॒। प्रऽभृ॑तिम्। यः। ईशि॑षे। अ॒या। वि॒धे॒म॒। नव॑या। म॒हा। गि॒रा। यथा॑। नः॒। मी॒ढ्वान्। स्तव॑ते। सखा॑। तव॑। बृह॑स्पते। सीस॑धः। सः। उ॒त। नः॒। म॒तिम्॥
पदार्थ : (सः) (इमाम्) (अविड्ढि) प्राप्नुहि (प्रभृतिम्) प्रकृष्टां धारणां पोषणं वा (यः) (ईशिषे) ईशनं करोषि (अया) अनया। अत्र छान्दसो वर्णलोप इति नलोपः (विधेम) प्राप्नुयाम (नवया) नवीनया (महा) महत्या (गिरा) वाण्या (यथा) (नः) अस्मान् (मीढ्वान्) विद्यायाः सेचकः (स्तवते) प्रशंसति (सखा) सुहृत् (तव) (बृहस्पते) बृहत्या वाचः स्वामिन् (सीषधः) साधय (सः) (उत) (नः) अस्मभ्यम् (मतिम्) प्रज्ञाम् ॥१॥
अन्वय : हे बृहस्पते विद्वन्नध्यापक यस्त्वमया नवया महा गिरेमां प्रभृतिं कर्त्तुमीशिषे स त्वमिमामविड्ढि। यथा तव मीढ्वान् सखा नः स्तवते यथा च स त्वं नो मतिमुत सीषधस्तथा च वयं विधेम ॥१॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये विद्यामुन्निनीषन्ति त आदौ वेदादिशास्त्राणि स्वयमधीत्यान्यान् प्रयत्नेनाध्यापयेयुः एवं कृत्वा पदार्थविज्ञानारूढां प्रज्ञामाप्नुयुश्च ॥१॥