Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 30 / 8

सर॑स्वति॒ त्वम॒स्माँ अ॑विड्ढि म॒रुत्व॑ती धृष॒ती जे॑षि॒ शत्रू॑न्। त्यं चि॒च्छर्ध॑न्तं तविषी॒यमा॑ण॒मिन्द्रो॑ हन्ति वृष॒भं शण्डि॑कानाम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 30 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सर॑स्वति। त्वम्। अ॒स्मान्। अ॒वि॒ड्ढि॒। म॒रुत्व॑ती। धृ॒ष॒ती। जे॒षि॒। शत्रू॑न्। त्यम्। चि॒त्। शर्ध॑न्तम्। त॒वि॒षी॒ऽयमा॑णम्। इन्द्रः॑। ह॒न्ति॒। वृ॒ष॒भम्। शण्डि॑कानाम्॥

पदार्थ : हे (सरस्वति) विज्ञानयुक्त विदुषी रानी (मरुत्वती) प्रशंसितरूपवाली (धृषती) प्रगल्भ्य उत्साहिनी आप जैसे (इन्द्रः) सेनापति (त्वम्) उस (शर्द्धन्तम्) बलवान् (तविषीयमाणम्) सेना जैसे युद्ध करें वैसा आचरण करते हुए (शण्डिकानाम्) शत्रुओं की सेना के अवयवरूप योद्धाओं में वर्त्तमान (वृषभम्) अत्यन्त बली शत्रु को (हन्ति) मारता है (चित्) और वैसे (अस्मान्) हमको (त्वम्) आप (अविड्ढि) व्याप्त वा प्राप्त हो और (शत्रून्) हमारे सुख को नष्ट करनेहारे शत्रुओं को (जेषि) जीतती हो इससे सबको सत्कार करने योग्य हो ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे राजा शत्रुओं को मार कर पुरुषों का सत्कार व न्याय करता है, वैसे ही रानी दुष्टा स्त्रियों को निवृत्त कर सब स्त्रियों की सदा रक्षा करे अर्थात् जैसे पुरुष न्यायाधीश हों, वैसे स्त्रियाँ भी हों ॥८॥