Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 31 / 2

अध॑ स्मा न॒ उद॑वता सजोषसो॒ रथं॑ देवासो अ॒भि वि॒क्षु वा॑ज॒युम्। यदा॒शवः॒ पद्या॑भि॒स्तित्र॑तो॒ रजः॑ पृथि॒व्याः सानौ॒ जङ्घ॑नन्त पा॒णिभिः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 31 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अध॑। स्म॒। नः॒। उत्। अ॒व॒त॒। स॒ऽजो॒ष॒सः॒। रथ॑म्। दे॒वा॒सः॒। अ॒भि। वि॒क्षु। वा॒ज॒ऽयुम्। यत्। आ॒शवः॑। पद्या॑भिः। तित्र॑तः। रजः॑। पृ॒थि॒व्याः। सानौ॑। जङ्घ॑नन्त। पा॒णिऽभिः॑॥

पदार्थ : हे (सजोषसः) आपस में बराबर प्रीति के निबाहनेवाले (रजः) लोकों के (तित्रतः) पार होते हुए (देवासः) विद्वान् लोगो ! तुम (नः) हमारे (वाजम्) वेग से चलनेवाले (रथम्) विमानादि यान को (विक्षु) प्रजाओं में (अभि,उत्,अवत) सब प्रकार चाहें (अध) इसके अनन्तर जैसे (यत्) जो (आशवः) शीघ्रगामी घोड़े चलते हैं वैसे (पद्याभिः) चलने योग्य गतियों से (पृथिव्याः) भूमि के (सानौ) ऊँचे प्रदेश में (पाणिभिः) हाथों से (स्म) ही (जङ्घनन्त) शीघ्र ताड़ना देओ ॥२॥

भावार्थ : जो मनुष्य हाथों में यन्त्रों को स्थिर कर और ताड़ना देकर इनको चलावें, तो वे घोड़े के तुल्य पृथिवी के ऊपर-ऊपर जाने-आने को समर्थ होते हैं ॥२॥