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Rigveda / 2 / 32 / 3

अहे॑ळता॒ मन॑सा श्रु॒ष्टिमा व॑ह॒ दुहा॑नां धे॒नुं पि॒प्युषी॑मस॒श्चत॑म्। पद्या॑भिरा॒शुं वच॑सा च वा॒जिनं॒ त्वां हि॑नोमि पुरुहूत वि॒श्वहा॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 32 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्रस्त्वष्टा वा | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अहे॑ळता। मन॑सा। श्रु॒ष्टिम्। आ। व॒ह॒। दुहा॑नाम्। धे॒नुम्। पि॒प्युषी॑म्। अ॒स॒श्चत॑म्। पद्या॑भिः। आ॒शुम्। वच॑सा। च॒। वा॒जिन॑म्। त्वाम्। हि॒नो॒मि॒। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। वि॒श्वहा॑॥

पदार्थ : हे (पुरुहूत) बहुतों से सत्कार पाये हुए आप (अहेळता) अनादर किये हुए (मनसा) विज्ञान से वा (पद्याभिः) प्राप्त करने योग्य क्रियाओं से (वचसा,च) और वचन से (असश्चतम्) अप्राप्त (पिप्युषीम्) बड़ी हुई बढ़ाने वा बढ़वाने (दुहानाम्) और सुख को अच्छे प्रकार पूरा करनेवाली (धेनुम्) गौ के समान वाणी को (विश्वहा) सब दिन (श्रुष्टिम्) शीघ्र (आ,वह) प्राप्त होओ वा प्राप्त कराओ मैं (वाजिनम्) प्रशंसित विज्ञानवाले (त्वाम्) आपको (हिनोमि) प्राप्त होता हूँ ॥३॥

भावार्थ : जो समाधानयुक्त अन्तःकरण से औरों के लिये उत्तम शिक्षायुक्त वाणी को शीघ्र प्राप्त कराता है, उसको सब सत्कार करके बढ़ावें ॥३॥