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Rigveda / 2 / 32 / 6

सिनी॑वालि॒ पृथु॑ष्टुके॒ या दे॒वाना॒मसि॒ स्वसा॑। जु॒षस्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि दिदिड्ढि नः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 32 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : सिनीवाली | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सिनी॑वालि। पृथु॑ऽस्तुके। या। दे॒वाना॑म्। असि॑। स्वसा॑। जु॒षस्व॑। ह॒व्यम्। आऽहु॑तम्। प्र॒ऽजाम्। दे॒वि॒। दि॒दि॒ड्ढि॒। नः॒॥

पदार्थ : हे (पृथुष्टुके) मोटी-मोटी जंघाओंवाली (सिनीवालि) जो अतिप्रेम से युक्त तू (देवानाम्) विद्वानों की (स्वसा) बहिन (असि) है सो तू मैंने जो (आहुतम्) सब ओर से होमा है उस (हव्यम्) देने योग्य द्रव्य को (जुषस्व) प्रीति से सेवन कर, हे (देवि) कामना करती हुई स्त्री तू हमारी (प्रजाम्) प्रजा को (दिदिड्ढि) देओ ॥६॥

भावार्थ : जो विद्वानों के कुल की कन्या विद्वानों की बन्धु ब्रह्मचर्य से विद्या को प्राप्त हुई प्रकाशमान हो उसे पत्नी कर विधि से इसमें सन्तानों को जो उत्पन्न करे, वह पुरुष और वह स्त्री दोनों सुखी हों ॥६॥