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Rigveda / 2 / 34 / 2

द्यावो॒ न स्तृभि॑श्चितयन्त खा॒दिनो॒ व्य१॒॑भ्रिया॒ न द्यु॑तयन्त वृ॒ष्टयः॑। रु॒द्रो यद्वो॑ मरुतो रुक्मवक्षसो॒ वृषाज॑नि॒ पृश्न्याः॑ शु॒क्र ऊध॑नि॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 34 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : मरुतः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : द्यावः॑। न। स्तृऽभिः॑। चि॒त॒य॒न्त॒। खा॒दिनः॑। वि। अ॒भ्रियाः॑। न। द्यु॒त॒य॒न्त॒। वृ॒ष्टयः॑। रु॒द्रः। यत्। वः॒। म॒रु॒तः॒। रु॒क्म॒ऽव॒क्ष॒सः॒। वृषा॑। अज॑नि। पृश्न्याः॑। शु॒क्रे। ऊध॑नि॥

पदार्थ : हे (रुक्मवक्षसः) दीप्ति और अभिप्रीति युक्त हृदयवाले (मरुतः) विद्वान् मनुष्यो (वः) तुम लोगों के लिये (यत्) जो (वृषा) सुख को सींचने और (रुद्रः) दुष्टों को रुलानेवाला मनुष्य (पृश्न्याः) अन्तरिक्ष के बीच (शुक्रे) वीर्य करनेवाली (ऊधनि) रात्रिमें (अजनि) उत्पन्न करे, वा (खादिनः) भक्षण करनेवाले आप लोग (स्तृभिः) नक्षत्रों से (द्यावा) प्रकाशों के (न) समान (चितयन्त) व्यवहारों को पवित्र करें और (अभ्रियाः) बद्दलों में (वृष्टयः) वर्षाओं के (न) समान (विद्युतयन्त) विशेषता से प्रकाशित करे, वह और आप माननीय हों ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो नक्षत्रों के साथ सूर्य्य के समान बद्दलों के साथ बिजली के समान विद्या व्यवहाररूपी प्रकाश में रमते हैं, वे सोने के लिये रात्रि के समान सबके सुख के लिये होते हैं ॥२॥