Rigveda / 2 / 36 / 2
य॒ज्ञैः संमि॑श्लाः॒ पृष॑तीभिर्ऋ॒ष्टिभि॒र्याम॑ञ्छु॒भ्रासो॑ अ॒ञ्जिषु॑ प्रि॒या उ॒त। आ॒सद्या॑ ब॒र्हिर्भ॑रतस्य सूनवः पो॒त्रादा सोमं॑ पिबता दिवो नरः॥
Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 36 | Mantra No : 2
In English:
Seer : gRRitsamadaH shaunakaH | Devta : maruto maadhavashch | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yaj~naiH sa.mmishlaaH pRRiShatiibhirRRiShTibhiryaama~nChubhraaso a~njiShu priyaa uta. aasadyaa barhirbharatasya suunavaH potraadaa soma.m pibataa divo naraH.
Component Words : yaj~naiH. sam.amishlaaH. pRRiShatiibhiH. RRIShTi.abhiH. yaaman. shubhraasaH. a~njiShu. priyaaH. uta. aa.asadya. barhiH. bharatasya. suunavaH. potraat. aa. somam. pibata. divaH. naraH.
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : मरुतो माधवश्च | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : य॒ज्ञैः। सम्ऽमि॑श्लाः। पृष॑तीभिः। ऋ॒ष्टिऽभिः॑। याम॑न्। शु॒भ्रासः॑। अ॒ञ्जिषु॑। प्रि॒याः। उ॒त। आ॒ऽसद्य॑। ब॒र्हिः। भ॒र॒त॒स्य॒। सू॒न॒वः॒। पो॒त्रात्। आ। सोम॑म्। पि॒ब॒त॒। दि॒वः॒। न॒रः॒॥
पदार्थ : हे (भरतस्य) धारण करनेवाले के (सूनवः) पुत्रो (नरः) नायक मनुष्यो जैसे (संमिश्लाः) अच्छे प्रकार मिले हुए (शुभ्रासः) श्वेतवर्ण (प्रियाः) प्यारे जन (यज्ञैः) अच्छी क्रियाओं से युक्त (ष्टिभिः) प्राप्ति करानेवाली (पृषतीभिः) पवन की गतियों से (यामन्) प्राप्त हुए समय में (उत) और (अञ्जिषु) कामना करते हुओं में (बर्हिः) अन्तरिक्ष को (आसद्य) पहुँचकर (पोत्रात्) पवित्र व्यवहार से उत्पन्न हुए (दिवः) प्रकाश से (सोमम्) ओषधियों के रस को पीते हैं वैसे तुम (आ, पिबत) पिओ ॥२॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे पवन अन्तरिक्ष में भ्रमते हुए सब प्राणियों को जिलाते हैं, और प्राणस्वरूप से प्यारे हैं तथा सबसे रस ऊपर को पहुँचा और वर्षा कर सबको आनन्दित करते हैं, वैसे मनुष्यों को होना चाहिये ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : मरुतो माधवश्च | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : य॒ज्ञैः। सम्ऽमि॑श्लाः। पृष॑तीभिः। ऋ॒ष्टिऽभिः॑। याम॑न्। शु॒भ्रासः॑। अ॒ञ्जिषु॑। प्रि॒याः। उ॒त। आ॒ऽसद्य॑। ब॒र्हिः। भ॒र॒त॒स्य॒। सू॒न॒वः॒। पो॒त्रात्। आ। सोम॑म्। पि॒ब॒त॒। दि॒वः॒। न॒रः॒॥
पदार्थ : (यज्ञैः) सक्रियामयैः (संमिश्लाः) सम्यग्मिश्राः (पृषतीभिः) मरुद्गतिभिः (ष्टिभिः) प्रापिकाभिः (यामन्) यामनि प्राप्ते काले (शुभ्रासः) श्वेतवर्णाः (अञ्जिषु) कामयमानेषु (प्रियाः) प्रीतिविषयाः (उत) अपि (आसद्य) प्राप्य। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः (बर्हिः) अन्तरिक्षे (भरतस्य) धारकस्य (सूनवः) पुत्राः (पोत्रात्) पवित्रात् (आ) (सोमम्) (पिबत)। अत्र संहितायामिति दीर्घः (दिवः) प्रकाशात् (नरः) नेतारः ॥२॥
अन्वय : हे भरतस्य सूनवो नरो यथा सम्मिश्ला शुभ्रासः प्रिया यज्ञैः पृषतीभिरृष्टिभिर्यामन्नुताञ्जिषु बर्हिरासद्य पोत्राद्दिवः सोमम्पिबन्ति तथा यूयमा पिबत ॥२॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या यथा वायवोऽन्तरिक्षे भ्रमन्तः सर्वान्प्राणिनो जीवयन्ति प्राणरूपेण प्रियाः सन्ति सर्वस्माद्रसमुपरिनीय वर्षित्वा सर्वानानन्दयन्ति तथा मनुष्यैरपि वर्त्तितव्यम् ॥२॥