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Rigveda / 2 / 37 / 2

यमु॒ पूर्व॒महु॑वे॒ तमि॒दं हु॑वे॒ सेदु॒ हव्यो॑ द॒दिर्यो नाम॒ पत्य॑ते। अ॒ध्व॒र्युभिः॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॑ पो॒त्रात्सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 37 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : द्रविणोदाः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यम्। ऊँ॒ इति॑। पूर्व॑म्। अहु॑वे। तम्। इ॒दम्। हु॒वे॒। सः। इत्। ऊँ॒ इति॑। हव्यः॑। द॒दिः। यः। नाम॑। पत्य॑ते। अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑। प्रऽस्थि॑तम्। सो॒म्यम्। मधु॑। पो॒त्रात्। सोम॑म्। द्र॒वि॒णः॒ऽदः॒। पिब॑। ऋ॒तुऽभिः॑॥

पदार्थ : हे (द्रविणोदः) धन देनेवाले जैसे (यः) जो (ददिः) देनेवाला (हव्यः) ग्रहण करने योग्य मैं (यम्, उ) जिसको (पूर्वम्) प्रथम (अहुवे) होमता हूँ (सः) सो मैं (तम्) उस (इदम्) इसको (नाम) प्रसिद्ध (इत्) ही (उ) तर्क-वितर्क के साथ (पत्यते) पति करने अर्थात् रक्षक की इच्छा करनेवाले के लिये (हुवे) ग्रहण करता हूँ। और (अध्वर्युभिः) अपने को हिंसा न चाहनेवाले जनों तथा (तुभिः) वसन्तादि तुओं के साथ वर्त्तमान जैसे मैं (प्रस्थितम्) ओषधियों से निकाले हुए (सोम्यम्) सोम के योग्य (मधु) मधुर गुणयुक्त रस को पीता हूँ वैसे (पोत्रात्) पवित्र करनेवाले से (सोमम्) महौषधियों के रस को तू (पिब) पी ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अविद्वान् पुरुष विद्वानों के साथ सङ्गति कर अन्न पान आदि की अच्छी परीक्षा करके उसको सेवते हैं, वे सुखी होते हैं ॥२॥