Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 38 / 2

विश्व॑स्य॒ हि श्रु॒ष्टये॑ दे॒व ऊ॒र्ध्वः प्र बा॒हवा॑ पृ॒थुपा॑णिः॒ सिस॑र्ति। आप॑श्चिदस्य व्र॒त आ निमृ॑ग्रा अ॒यं चि॒द्वातो॑ रमते॒ परि॑ज्मन्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 38 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : सविता | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : विश्व॑स्य। हि। श्रु॒ष्टये॑। दे॒वः। ऊ॒र्ध्वः। प्र। बा॒हवा॑। पृ॒थुऽपा॑णिः। सिस॑र्ति। आपः॑। चि॒त्। अ॒स्य॒। व्र॒ते। आ। निऽमृ॑ग्राः। अ॒यम्। चि॒त्। वातः॑। र॒म॒ते॒। परि॑ऽज्मन्॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अयम्) यह (परिज्मन्) सब ओर से व्याप्त होता हुआ वा (वातः) पवन (रमते) क्रीडा को करता है (अस्य) इसके (व्रते) शीलस्वभाव के निमित्त (निमृग्राः) निरन्तर शुद्धि के हेतु (आपः) जल (चित्) भी (आ) अच्छे प्रकार रमण करते हैं जो (विश्वस्य) जगत् के बीच (ऊर्ध्वः) ऊपर स्थित (पृथुपाणिः) जिसके विस्तीर्ण हाथों के समान किरण वह (देवः) दिव्य सुख देनेवाला (सविता) जगत् का उत्पन्न करनेवाला (श्रुष्टये) शीघ्रता के लिये (बाहवा) भुजाओं के (चित्) समान (प्र,सिसर्त्ति) जाता है, यह सब उक्त वृत्तान्त परमेश्वर के बीच में (हि) ही वर्त्तमान है ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो परमेश्वर भूमि, जल, अग्नि और पवनों को न बनाता तो कुछ भी अपने आप उत्पन्न न हो सके ॥२॥