Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 38 / 10

भगं॒ धियं॑ वा॒जय॑न्तः॒ पुर॑न्धिं॒ नरा॒शंसो॒ ग्नास्पति॑र्नो अव्याः। आ॒ये वा॒मस्य॑ संग॒थे र॑यी॒णां प्रि॒या दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स्या॑म॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 38 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : सविता | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : भग॑म्। धिय॑म्। वा॒जय॑न्तः। पुर॑म्ऽधिम्। नरा॒शंसः॑। ग्नाःपतिः॑। नः॒। अ॒व्याः॒। आ॒ऽअ॒ये। वा॒मस्य॑। स॒म्ऽग॒थे। र॒यी॒णाम्। प्रि॒याः। दे॒वस्य॑। स॒वि॒तुः। स्या॒म॒॥

पदार्थ : जो (नराशंसः) मनुष्यों ने प्रशंसित किया हुआ (पतिः) पालना करनेवाला ईश्वर (नः) हम लोगों (ग्नाः) और वाणियों की (अव्याः) रक्षा करे और उस (भगम्) समस्त ऐश्वर्य की (धियम्) जो चिन्तन करने योग्य है वा (पुरन्धिम्) समस्त जगत् के धारण करनेवाले को (वाजयन्तः) जानते वा उसका विज्ञान कराते हुए हम लोग (रयीणाम्) धनों के (आये) इस व्यवहार में जो सब ओर से प्राप्त होता और (सङ्गथे) संग्राम में (वामस्य) प्रशंसनीय (सवितुः) सकल जगत् के बनानेवाले (देवस्य) भगवान् परमात्मा के (प्रियाः) प्रीति विषय निरन्तर (स्याम) हों ॥१०॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! सबकी रक्षा और धारण करनेवाले प्रशंसित सबके स्वामी परमेश्वर की उपासना कर उसकी आज्ञा के आचरण से उसके प्यारे तुम होओ ॥१०॥