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Rigveda / 2 / 41 / 2

नि॒युत्वा॑न्वाय॒वा ग॑ह्य॒यं शु॒क्रो अ॑यामि ते। गन्ता॑सि सुन्व॒तो गृ॒हम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 41 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : वायु: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : नि॒युत्वा॑न्। वा॒यो॒ इति॑। आ। ग॒हि॒। अ॒यम्। शु॒क्रः। अ॒या॒मि॒। ते॒। गन्ता॑। अ॒सि॒। सु॒न्व॒तः। गृ॒हम्॥

पदार्थ : हे (वायो) पवन के समान वर्त्तमान विद्वान् ! जिस कारण आप (शुक्रः) अज्ञानताओं को सुखानेवाले होते हुए (सुन्वतः) ओषधियों के रस निकालनेवाले के (गृहम्) घर (गन्ता) जानेवाले (असि) हैं इस कारण (नियुत्वान्) आत्मा से नियमयुक्त जितेन्द्रिय होते हुए (आ,गहि) आओ जैसे (अयम्) यह वायु नियमयुक्त सर्वत्र जानेवाला है, वैसे मैं (ते) आपके घर को (अयामि) प्राप्त होता हूँ ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे पवन नियम से सर्वत्र जाते हैं, वैसे नियमयुक्त कर्मों को कर सुखों को प्राप्त होना चाहिये ॥२॥