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Rigveda / 2 / 42 / 2

मा त्वा॑ श्ये॒न उद्व॑धी॒न्मा सु॑प॒र्णो मा त्वा॑ विद॒दिषु॑मान्वी॒रो अस्ता॑। पित्र्या॒मनु॑ प्र॒दिशं॒ कनि॑क्रदत्सुम॒ङ्गलो॑ भद्रवा॒दी व॑दे॒ह॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 42 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : कपिञ्जलइवेन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं।

पदपाठ : मा। त्वा॒। श्ये॒नः। उत्। व॒धी॒त्। मा। सु॒ऽप॒र्णः। मा। त्वा॒। वि॒द॒त्। इषु॑ऽमान्। वी॒रः। अस्ता॑। पित्र्या॑म्। अनु॑। प्र॒ऽदिश॑म्। कनि॑क्रदत्। सु॒ऽम॒ङ्गलः॑। भ॒द्र॒ऽवा॒दी। व॒द॒। इ॒ह॥

पदार्थ : हे विद्वान् ! (त्वा) तुझे (श्येनः) श्येन पक्षी के समान कोई (मा, उत् वधीत्) मत उच्चाटे (मा) मत (सुवर्णः) अच्छे पंखवाले अन्य पक्षी के समान उच्चाटे (त्वा) तुझे (इषुमान्) वाणों को रखने वा (अस्ता) फेंकनेवाला (वीरः) वीर (मा, विदत्) मत प्राप्त हो (इह) यहाँ (कनिक्रदत्) निरन्तर कहता हुआ (भद्रवादी) कल्याणरूप उपदेश करनेवाला (सुमङ्गलः) सुन्दर मङ्गल का उपदेशक होता हुआ (पित्र्याम्) पितृसम्बन्धी (प्रदिशम्) दिशा और उपदिशाओं से युक्त देश को (अनु,वद) अनुकूलता से उपदेश कर ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे श्येन पक्षी पखेरू अन्य पक्षियों को मारते हैं, वैसे कोई उपदेशक को पीड़ा मत दे, जिससे वह सुख और कुशलता से सर्वत्र उपदेश कर सके ॥२॥