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Rigveda / 3 / 1 / 10

पि॒तुश्च॒ गर्भं॑ जनि॒तुश्च॑ बभ्रे पू॒र्वीरेको॑ अधय॒त्पीप्या॑नाः। वृष्णे॑ स॒पत्नी॒ शुच॑ये॒ सब॑न्धू उ॒भे अ॑स्मै मनु॒ष्ये॒३॒॑ नि पा॑हि॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 1 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : पि॒तुः। च॒। गर्भ॑म्। ज॒नि॒तुः। च॒। ब॒भ्रे॒। पू॒र्वीः। एकः॑। अ॒ध॒य॒त्। पीप्या॑नाः। वृष्णे॑। स॒पत्नी॒ इति॑ स॒पत्नी॑। शुच॑ये। सब॑न्धू इति॑ सऽब॑न्धू। उ॒भे इति॑। अ॒स्मै॒। म॒नु॒ष्ये॒३॒॑ इति॑। नि। पा॒हि॒॥

पदार्थ : जैसे (अस्मै) इस (शुचये) पवित्र (वृष्णे) वीर्य सेचनेवाले मनुष्य के अर्थ (सपत्नी) समान जिसका पति वह स्त्री (गर्भम्) गर्भ को (बभ्रे) धारण करती वह (एकः) एक गर्भ (पितुः) पालन करनेवाले (च) और सुन्दर अन्नादि और (जनितुः) जन्म देनेवाले पिता की (च) और धाई की उत्तेजना से जन्म पाकर (पूर्वीः) पहिले उत्पन्न हुई (पीप्यानाः) बढ़ती हुई प्रजा (अधयत्) दुग्ध पीती हैं वैसे (उभे) दोनों स्त्री पुरुष (सबन्धू) एक समान बन्धुओं के समान प्रीति रखनेवाले (मनुष्ये) मनुष्य के लिये जो हित उस के निमित्त (गर्भम्) गर्भ की रक्षा करते हैं वैसे हे विद्वन् एक होते आप (नि, पाहि) निरन्तर पालना करो ॥१०॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब माता पिता गर्भ को धारण करते हैं और उस की रक्षा कर दुग्धपान आदि से बढ़ाते हैं, वैसे स्त्री पुरुष प्रीति को बढ़ाकर गर्भ को धारण कर उसे अच्छे प्रकार पाल मनुष्यों के हित के लिये अपने सन्तानों को विद्या ग्रहण करावें ॥१०॥