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Rigveda / 3 / 2 / 3

क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य॒ तरु॑षो॒ विध॑र्मणि दे॒वासो॑ अ॒ग्निं ज॑नयन्त॒ चित्ति॑भिः। रु॒रु॒चा॒नं भा॒नुना॒ ज्योति॑षा म॒हामत्यं॒ न वाजं॑ सनि॒ष्यन्नुप॑ ब्रुवे॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 2 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निर्वैश्वानरः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : क्रत्वा॑। दक्ष॑स्य। तरु॑षः। विऽध॑र्मणि। दे॒वासः॑। अ॒ग्निम्। ज॒न॒य॒न्त॒। चित्ति॑ऽभिः। रु॒रु॒चा॒नम्। भा॒नुना॑। ज्योति॑षा। म॒हाम्। अत्य॑म्। न। वाज॑म्। स॒नि॒ष्यन्। उप॑। ब्रु॒वे॒॥

पदार्थ : जैसे (देवासः) विद्या की कामना करनेवाला (क्रत्वा) बुद्धि वा कर्म से (दक्षस्य) बल (तरुषः) जो कि दुःखों से अच्छे प्रकार तारनेवाला उसके (विधर्मणि) विविध कर्म में (चित्तिभिः) इन्धन आदि की चयन क्रियाओं से (भानुना) जो प्रकाश उससे (रुरुचानम्) अत्यन्त दीप्तिमान् (ज्योतिषा) तेजसे (महाम्) महान् (वाजम्) वेगवान् (अग्निम्) अग्नि को (अत्यम्) अश्व के (न) समान (जनयन्त) उत्पन्न करें वैसे इस अग्नि को [(सनिष्यन्) सेवन करता हुआ] मैं ओरों को (उप, ब्रुवे) उपदेश करता हूँ ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि क्रिया कौशलता के साथ अग्नि से उपकार लिया चाहें, तो यह अत्यन्त कार्य्यसिद्धि करनेवाला हो ॥३॥