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Rigveda / 3 / 3 / 6

अ॒ग्निर्दे॒वेभि॒र्मनु॑षश्च ज॒न्तुभि॑स्तन्वा॒नो य॒ज्ञं पु॑रु॒पेश॑सं धि॒या। र॒थीर॒न्तरी॑यते॒ साध॑दिष्टिभिर्जी॒रो दमू॑ना अभिशस्ति॒चात॑नः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 3 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : वैश्वानरोऽग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर अग्निविद्या के उपदेश को कहते हैं।

पदपाठ : अ॒ग्निः। दे॒वेभिः॑। मनु॑षः। च॒। ज॒न्तुऽभिः॑। त॒न्वा॒नः। य॒ज्ञम्। पु॒रु॒ऽपेश॑सम्। धि॒या। र॒थीः। अ॒न्तः। ई॒य॒ते॒। साध॑दिष्टिऽभिः। जी॒रः। दमू॑नाः। अ॒भि॒श॒स्ति॒ऽचात॑नः॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अभिशस्तिचातनः) सब ओर से हिंसा की याचना करता (दमूनाः) और दमनशील (साधदिष्टिभिः) अच्छे प्रकार सिद्ध किई हुई इच्छाओं के साथ (जीरः) वेगवान् (रथीः) जिसके बहुत रथ विद्यमान (जन्तुभिः) मनुष्यों के साथ (मनुषः) मनुष्यों को (तन्वानः) विस्तार अर्थात् उनको वृद्धि देता हुआ और (देवेभिः) दिव्यगुणों के साथ (अग्निः) अग्नि (ईयते) जाता है तथा (धिया) कर्म से (पुरुपेशसम्) बहुत रूपोंवाले [(यज्ञम्)] प्राप्त संसार को सिद्ध करता है, उसको जानो ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जो अग्नि सामान्य रूप से सब पदार्थों को पुष्ट करता वा विशेष रूप से उनको नष्ट करता वा पृथिव्यादिकों के भीतर व्याप्त है अर्थात् उनके प्रत्येक परमाणु के साथ है वा जिससे बहुत व्यवहार सिद्ध होते हैं, वह अग्नि विशेषता से जानने योग्य है ॥६॥