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Rigveda / 3 / 3 / 9

वि॒भावा॑ दे॒वः सु॒रणः॒ परि॑ क्षि॒तीर॒ग्निर्ब॑भूव॒ शव॑सा सु॒मद्र॑थः। तस्य॑ व्र॒तानि॑ भूरिपो॒षिणो॑ व॒यमुप॑ भूषेम॒ दम॒ आ सु॑वृ॒क्तिभिः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 3 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : वैश्वानरोऽग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : वि॒भाऽवा॑। दे॒वः। सु॒ऽरणः। परि॑। क्षि॒तीः। अ॒ग्निः। ब॒भू॒व॒। शव॑सा। सु॒मत्ऽर॑थः। तस्य॑। व्र॒तानि॑। भू॒रि॒ऽपो॒षिणः॑। व॒यम्। उप॑। भू॒षे॒म॒। दमे॑। आ। सु॒वृ॒क्तिऽभिः॑॥

पदार्थ : हे विद्वान् ! जैसे आप (विभावा) विविध दीप्तिमान् (देवः) मनोहर (सुरणः) सुन्दर रण जिससे होता वा (सुमद्रथः) जिससे प्रशंसित ज्ञानों का रथ के समान रथ होता (अग्निः) ऐसा अग्नि (सुवृक्तिभिः) सुन्दर वार्ताओं से और (शवसा) बल से (क्षितीः) पृथिवियों को (परि, बभूव) सब ओर से व्याप्त होता अर्थात् उनका तिरस्कार करता (तस्य) उसके (व्रतानि) शीलों को (भूरिपोषिणः) बहुत प्रकार पोषण पुष्टि जिनके विद्यमान वे (वयम्) हम लोग (दमे) घर में (उपाभूषेम) अपने समीप अच्छे प्रकार भूषित करते हैं ॥९॥

भावार्थ : जैसे विद्वान् जन मनुष्यों के बीच बहुत पुष्टि देने और ऐश्वर्य की प्राप्ति करानेवाले तथा परोपकार से अलङ्कृत हों, वे राज्य के ऐश्वर्य को प्राप्त हों ॥९॥