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Rigveda / 3 / 3 / 11

वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ दं॒सना॑भ्यो बृ॒हदरि॑णा॒देकः॑ स्वप॒स्यया॑ क॒विः। उ॒भा पि॒तरा॑ म॒हय॑न्नजायता॒ग्निर्द्यावा॑पृथि॒वी भूरि॑रेतसा॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 3 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : वैश्वानरोऽग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : वै॒श्वा॒न॒रस्य॑। दं॒सना॑भ्यः। बृ॒हत्। अरि॑णात्। एकः॑। सु॒ऽअ॒प॒स्यया॑। क॒विः। उ॒भा। पि॒तरा॑। म॒हय॑न्। अ॒जा॒य॒त॒। अ॒ग्निः। द्यावा॑पृथि॒वी इति॑। भूरि॑ऽरेतसा॥

पदार्थ : जो (एकः) एकाकी (कविः) सर्वशास्त्रों को जाननेवाला (स्वपस्यया) अपने को उत्तम की इच्छा से (वैश्वानरस्य) सर्वत्र प्रकाशमान अग्नि को (दंसनाभ्यः) सुख करनेवाली क्रियाओं से (बृहत्) महान् कार्य को (अरिणात्) प्राप्त होवे वा (अग्निः) अग्नि (भूरिरेतसा) बहुत जल जिसमें विद्यमान उस अन्तरिक्ष के साथ वर्त्तमान (द्यावापृथिवी) सूर्य और पृथिवी को प्रकाशित करता हुआ (अजायत) प्रसिद्ध होता है वैसे (उभा) दोनों (पितरा) माता-पिता को (महयन्) सत्कार करता हुआ वर्त्तमान है, वह सुखी कैसे न होवे? ॥११॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों के तुल्य कर्म और माता-पिताओं का सत्कार करते, वे पृथिवी और सूर्य के समान उत्तम गुणवाले होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥११॥ यह तीसरा सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥