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Rigveda / 3 / 4 / 4

ऊ॒र्ध्वो वां॑ गा॒तुर॑ध्व॒रे अ॑कार्यू॒र्ध्वा शो॒चींषि॒ प्रस्थि॑ता॒ रजां॑सि। दि॒वो वा॒ नाभा॒ न्य॑सादि॒ होता॑ स्तृणी॒महि॑ दे॒वव्य॑चा॒ वि ब॒र्हिः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 4 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : आप्रियः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : ऊ॒र्ध्वः। वा॒म्। गा॒तुः। अ॒ध्व॒रे। अ॒का॒रि॒। ऊ॒र्ध्वा। शो॒चींषि॑। प्रस्थि॑ता। रजां॑सि। दि॒वः। वा॒। नाभा॑। नि। अ॒सा॒दि॒। होता॑। स्तृ॒णी॒महि॑। दे॒वऽव्य॑चाः। वि। ब॒र्हिः॥

पदार्थ : हे यज्ञ करने और यज्ञ सिद्ध करानेवालो ! (वाम्) तुम्हारे (अध्वरे) न नष्ट करने योग्य व्यवहार में वह (ऊर्द्ध्वः) ऊपर जाने (गातुः) और स्तुति करनेवाला (अकारि) किया जाता (देवव्यचाः) बहुत यज्ञ पृथिव्यादिकों को व्याप्त होने वा (होता) पदार्थों को ग्रहण करनेवाला (नि, असादि) सिद्ध किया जाता है, जिस यज्ञ से हम लोग (ऊर्द्ध्वा) ऊपर जानेवाले (प्रस्थिता) जाने का आरम्भ किये हुए (शोचींषि) तेजों को और (रजांसि) लोकों को तथा (दिवः) किरणों को (वा) वा (बर्हिः) अन्तरिक्ष को (नाभा) नाभी के बीच (विस्तृणीमहि) विस्तारते हैं ॥४॥

भावार्थ : जो यज्ञकर्ता और यज्ञ करानेवाले विद्वान् हों और सुन्दर शुद्ध पदार्थों को अग्नि में छोड़ें, तो क्या-क्या सुख प्राप्त न हों? ॥४॥