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Rigveda / 3 / 9 / 6

तं त्वा॒ मर्ता॑ अगृभ्णत दे॒वेभ्यो॑ हव्यवाहन। विश्वा॒न्यद्य॒ज्ञाँ अ॑भि॒पासि॑ मानुष॒ तव॒ क्रत्वा॑ यविष्ठ्य॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 9 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उपदेशक विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : तम्। त्वा॒। मर्ताः॑। अ॒गृ॒भ्ण॒त॒। दे॒वेभ्यः॑। ह॒व्य॒ऽवा॒ह॒न॒। विश्वा॑न्। यत्। य॒ज्ञान्। अ॒भि॒ऽपासि॑। मा॒नु॒ष॒। तव॑। क्रत्वा॑। य॒वि॒ष्ठ्य॒॥

पदार्थ : हे (मानुष) मननशील (हव्यवाहन) ग्रहण करने योग्य शास्त्रीय युक्ति-युक्त वचनों को प्राप्त करानेहारे (यविष्ठ्य) अत्यन्त ब्रह्मचर्य और विद्या के अभ्यास से युवावस्था को प्राप्त उपदेशक विद्वन् ! (यत्) जो आप (विश्वान्) समस्त (यज्ञान्) विद्यादि के प्रापक व्यवहारों की (अभि, पासि) सब ओर से रक्षा करते हैं उन (तव) आपकी (क्रत्वा) बुद्धि से (मर्त्ताः) मरण धर्मवाले मनुष्य (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (तम्) उन (त्वा) आपको (अगृभ्णत) ग्रहण करें ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिसके उपदेश से बुद्धि को प्राप्त होकर समग्र सुखों को आप लोग प्राप्त होवें, उसका सब ओर से सत्कार करो ॥६॥