Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 10 / 3

स घा॒ यस्ते॒ ददा॑शति स॒मिधा॑ जा॒तवे॑दसे। सो अ॑ग्ने धत्ते सु॒वीर्यं॒ स पु॑ष्यति॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 10 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब मनुष्य कैसे सुखों को प्राप्त हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। घ॒। यः। ते॒। ददा॑शति। स॒मिधा॑। जा॒तऽवे॑दसे। सः। अ॒ग्ने॒। ध॒त्ते॒। सु॒ऽवीर्य॑म्। सः। पु॒ष्य॒ति॒॥

पदार्थ : हे (अग्ने) सबके प्रकाशक जन ! (यः) जो (समिधा) सम्यक् प्रकाशक इन्धन वा सुन्दर विज्ञान से (जातवेदसे) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान वा बुद्धि को प्राप्त हुए (ते) आपके लिये आत्मा अपने स्वरूप को (ददाशति) देता प्राप्त कराता है (सः, घ) वही (सुवीर्य्यम्) सुन्दर विज्ञानादि धन वा पराक्रम को (धत्ते) धारण करता (सः) वह (पुष्यति) सब ओर से पुष्ट होता और (सः) वह दूसरों को पुष्ट करता है ॥३॥

भावार्थ : जैसे प्राणी अग्नि में घृतादि उत्तम द्रव्य का होम कर वायु आदि की शुद्धि होने से सब आनन्द [को] प्राप्त होते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग परमात्मा में अपने आत्मा का समर्पण कर समस्त सुखों को प्राप्त होते हैं ॥३॥