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Rigveda / 3 / 12 / 3

इन्द्र॑म॒ग्निं क॑वि॒च्छदा॑ य॒ज्ञस्य॑ जू॒त्या वृ॑णे। ता सोम॑स्ये॒ह तृ॑म्पताम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 12 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : इन्द्र॑म्। अ॒ग्निम्। क॒वि॒ऽछदा॑। य॒ज्ञस्य॑। जू॒त्या। वृ॒णे॒। ता। सोम॑स्य। इ॒ह। तृ॒म्प॒ता॒म्॥

पदार्थ : मैं जिन (जूत्वा) वेग के सहित वर्त्तमान (कविच्छदा) विद्वानों का सत्संग करनेवाले (इन्द्रम्) दुष्टों के दोषों के नाशकर्ता और (अग्निम्) अग्नि के सदृश दुष्टों के भस्मकारक जनों को (वृणे) स्वीकार करता हूँ (ता) वे (इह) इस संसार में (सोमस्य) ऐश्वर्य्य और (यज्ञस्य) धर्मसम्बन्धी व्यवहार के मध्य में (तृम्पताम्) सुख भोगें और सबको सुखी करें ॥३॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि मूर्ख लोगों का सङ्ग त्याग के और विद्वानों का सङ्ग करके उत्तम आचरण करने से इस संसार में ऐश्वर्य्य का संग्रह करके सदा ही आनन्दयुक्त रहैं ॥३॥