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Rigveda / 3 / 13 / 3

स य॒न्ता विप्र॑ एषां॒ स य॒ज्ञाना॒मथा॒ हि षः। अ॒ग्निं तं वो॑ दुवस्यत॒ दाता॒ यो वनि॑ता म॒घम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 13 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ऋषभो वैश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। य॒न्ता। विप्रः॑। ए॒षा॒म्। सः। य॒ज्ञाना॑म्। अथ॑। हि। सः। अ॒ग्निम्। तम्। वः॒। दु॒व॒स्य॒त॒। दाता॑। यः। वनि॑ता। म॒घम्॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (विप्रः) बुद्धिमान् पुरुष (एषाम्) इन विद्या और उत्तमशिक्षायुक्त (यज्ञानाम्) करने योग्य व्यवहारों को और (वः) आप लोगों का (यन्ता) कुमार्ग से निवारणकर्ता (दाता) दानशील (वनिता) माँगनेवाला होवे (तम्) उस (अग्निम्) अग्नि के सदृश प्रकाशमान जन को और उससे प्राप्त हुए (मघम्) अत्यन्त पूजने योग्य धन को, (दुवस्यत) सेवो (सः) वह (हि) जिससे कि अपने आप ही जितेन्द्रिय इससे (सः) वह अपने आपही बुद्धिमान् (अथ) इसके अनन्तर (सः) वह स्वयं दानशील यज्ञों के करने से उत्तम गुणों का माँगनेवाला होवे ॥३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो पुरुष अपने आप धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, सत्य का प्रचारक, श्रेष्ठगुणों का देने और ग्रहण करनेवाला, स्वभाव का धर्म में प्रवर्त्तनकर्त्ता होवे, उसकी सम्पूर्ण उपायों से सेवा करो ॥३॥