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Rigveda / 3 / 16 / 3

स त्वं नो॑ रा॒यः शि॑शीहि॒ मीढ्वो॑ अग्ने सु॒वीर्य॑स्य। तुवि॑द्युम्न॒ वर्षि॑ष्ठस्य प्र॒जाव॑तोऽनमी॒वस्य॑ शु॒ष्मिणः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 16 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : उत्कीलः कात्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। त्वम्। नः॒। रा॒यः। शि॒शी॒हि॒। मीढ्वः॑। अ॒ग्ने॒। सु॒ऽवीर्य॑स्य। तुवि॑ऽद्युम्न। वर्षि॑ष्ठस्य। प्र॒जाऽव॑तः। अ॒न॒मी॒वस्य॑। शु॒ष्मिणः॑॥

पदार्थ : हे (मीढ्वः) सुखों के दाता (तुविद्युम्न) बहुत प्रकार के धन वा यश से युक्त (अग्ने) अग्नि के समान तेजोवान् ! (सः) वह (त्वम्) आप (नः) हम लोगों के लिये (सुवीर्य्यस्य) उत्तम वीरों में उत्पन्न (वर्षिष्ठस्य) अतिवृद्ध और (प्रजावतः) अत्यन्त प्रजायुक्त (अनमीवस्य) रोगरहित (शुष्मिणः) अत्यन्त बल सहित पुरुष के (रायः) धनों को (शिशीहि) अति बढ़ाइये ॥३॥

भावार्थ : जो मनुष्य धन से सेना श्रेष्ठता प्रजा आरोग्य और बल को बढ़ाते हैं, वे लोग सर्वदा बहुत धनवाले होते हैं ॥३॥