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Rigveda / 3 / 23 / 3

दश॒ क्षिपः॑ पू॒र्व्यं सी॑मजीजन॒न्त्सुजा॑तं मा॒तृषु॑ प्रि॒यम्। अ॒ग्निं स्तु॑हि दैववा॒तं दे॑वश्रवो॒ यो जना॑ना॒मस॑द्व॒शी॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 23 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : देवश्रवा देववातश्च भारती | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : दश॑। क्षिपः॑। पू॒र्व्यम्। सी॒म्। अ॒जी॒ज॒न॒न्। सुऽजा॑तम्। मा॒तृषु॑। प्रि॒यम्। अ॒ग्निम्। स्तु॒हि॒। दै॒व॒ऽवा॒तम्। दे॒व॒ऽश्र॒वः॒। यः। जना॑नाम्। अस॑त्। व॒शी॥

पदार्थ : हे (देवश्रवः) विद्वानों के लिये उपकार श्रोता ! आप जैसे (दश) दश संख्यायुक्त (क्षिपः) फैलनेवाली अङ्गुलियाँ (मातृषु) नदियों में (प्रियम्) कामना करने योग्य (सुजातम्) उत्तम प्रकार सिद्ध (दैववातम्) विद्वानों से जाने हुओं का सम्बन्धी (पूर्व्यम्) प्राचीन जनों से उत्पन्न (अग्निम्) अग्नि को (सीम्) सब प्रकार (अजीजनन्) उत्पन्न करते हैं वैसे आप (स्तुहि) स्तुति करो और (यः) जो (जनानाम्) मनुष्यों के मध्य में (वशी) इन्द्रियजित् (असत्) होवे उसकी प्रशंसा करो ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे हाथों की अङ्गुलियों से बहुत कार्य्यं सिद्ध होते हैं, वैसे ही अग्नि आदिकों से बहुत कार्यों को आप लोग सिद्ध करो ॥३॥