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Rigveda / 3 / 25 / 3

अ॒ग्निर्द्यावा॑पृथि॒वी वि॒श्वज॑न्ये॒ आ भा॑ति दे॒वी अ॒मृते॒ अमू॑रः। क्षय॒न्वाजैः॑ पुरुश्च॒न्द्रो नमो॑भिः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 25 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒ग्निः। द्यावा॑पृथि॒वी इति॑। वि॒श्वज॑न्ये॒ इति॑ वि॒श्वऽज॑न्ये। आ। भा॒ति॒। दे॒वी इति॑। अ॒मृते॒ इति॑। अमू॑रः। क्षय॑न्। वाजैः॑। पु॒रु॒ऽच॒न्द्रः। नमः॑ऽभिः॥

पदार्थ : हे विद्वान् जन ! जैसे (पुरुश्चन्द्रः) बहुत आनन्दकारक (वाजैः) विज्ञान वेग आदिकों से (नमोभिः) अन्न वा सत्कारों के साथ (क्षयन्) निवास करनेवाला (अग्निः) सूर्य्य वा विद्युत् रूप अग्नि (विश्वजन्ये) सबके उत्पादक (देवी) उत्तम गुण कर्म स्वभावयुक्त (अमृते) कारणरूप से नाशरहित (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि को (आ) सब ओर से (भाति) प्रकाशित करता है वैसे (अमूरः) मूढ़ता आदि दोषों से रहित होकर सम्पूर्ण सज्जनों को अपनी विद्या और विनय से सब प्रकार प्रकाशित करो ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग पृथिवी के सदृश क्षमाशील, सूर्य्य के सदृश सत्य असत्य के प्रकाशकर्ता, मूढ़ लोगों को उपदेशदाता और सब लोगों को धार्मिक करते हैं, उन लोगों का ही सत्कार करना चाहिये ॥३॥