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Rigveda / 3 / 28 / 2

पु॒रो॒ळा अ॑ग्ने पच॒तस्तुभ्यं॑ वा घा॒ परि॑ष्कृतः। तं जु॑षस्व यविष्ठ्य॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 28 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : पु॒रो॒ळाः। अ॒ग्ने॒। प॒च॒तः। तुभ्य॑म्। वा॒। घ॒। परि॑ऽकृतः। तम्। जु॒ष॒स्व॒। य॒वि॒ष्ठ्य॒॥

पदार्थ : हे (यविष्ठ्य) अतिशय युवा पुरुषों में चतुर (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी जन ! जो (तुभ्यम्) आपके लिये (पुरोळाः) वेद विधि से संस्कारयुक्त (पचतः) पाककर्त्ता हुआ (वा) अथवा (परिष्कृतः) सब प्रकार शुद्ध किया गया है (तम्) उसकी (घ) ही (जुषस्व) सेवा करो ॥२॥

भावार्थ : जैसे भोजन में प्रीतिकर्त्ता पुरुष अपने लिये उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न आदि पदार्थों को सिद्ध और उनका भोजन करके आनन्दयुक्त होता है, वैसे ही उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त हवन की सामग्री को प्राप्त होकर अग्नि सम्पूर्ण जनों को आनन्द देता है ॥२॥